होल्डिंग टैक्स क्या है? जानिए क्यों जरूरी है और बिहार में क्या हैं इसके नियम

यह लेख होल्डिंग टैक्स की पूरी जानकारी आसान और प्राकृतिक भाषा में समझाता है। इसमें बताया गया है कि होल्डिंग टैक्स क्या होता है और यह नगर निगम द्वारा क्यों लिया जाता है। लेख में इसके मुख्य फायदे, कानूनी महत्व और प्रॉपर्टी रिकॉर्ड से जुड़े पहलुओं को भी स्पष्ट किया गया है। साथ ही यह समझाया गया है कि टैक्स किन लोगों को देना होता है और यह कैसे तय किया जाता है। बिहार में होल्डिंग टैक्स की व्यवस्था, होल्डिंग नंबर और भुगतान के तरीके पर भी विशेष जानकारी दी गई है। अंत में नागरिकों से अपील की गई है कि वे समय पर टैक्स जमा कर अपने शहर के विकास में भागीदारी निभाएं।

परिचय

अगर आपके पास शहर में घर, दुकान या कोई बिल्डिंग है, तो “होल्डिंग टैक्स” शब्द आपने कभी न कभी जरूर सुना होगा। कई लोग इसे हाउस टैक्स समझ लेते हैं, तो कुछ लोग इसे कोई अलग तरह का सरकारी शुल्क मानते हैं। सच कहें तो होल्डिंग टैक्स को लेकर आम लोगों के मन में काफी भ्रम रहता है। कुछ लोगों को लगता है कि यह सिर्फ बड़े मकान मालिकों के लिए होता है, जबकि कई लोग यह सोचकर नजरअंदाज कर देते हैं कि जब तक कोई नोटिस नहीं आएगा, तब तक इसकी जरूरत ही क्या है।

असल में होल्डिंग टैक्स शहर में रहने वाले प्रॉपर्टी मालिकों से लिया जाने वाला एक स्थानीय कर है, जिसे नगर निगम या नगर परिषद वसूलती है। यह टैक्स सीधे तौर पर हमारे ही शहर के विकास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा होता है। जिस सड़क पर हम चलते हैं, जिस नाली से पानी निकलता है, जिस स्ट्रीट लाइट से रात में रोशनी मिलती है — इन सबके पीछे कहीं न कहीं यही टैक्स काम करता है।

लेकिन जानकारी की कमी के कारण लोग या तो इसे समझ नहीं पाते या फिर समय पर भुगतान नहीं करते। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में आज भी कई मकान मालिकों को यह स्पष्ट नहीं है कि होल्डिंग टैक्स क्या है, क्यों देना जरूरी है और नहीं देने पर क्या परिणाम हो सकते हैं।

इसी भ्रम को दूर करने और सही जानकारी देने के उद्देश्य से इस लेख में हम होल्डिंग टैक्स को आसान और प्राकृतिक भाषा में विस्तार से समझेंगे, ताकि हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से समझ सके।

Holding tax notice with residential house in Indian city

होल्डिंग टैक्स क्या है?

होल्डिंग टैक्स दरअसल नगर निगम, नगर परिषद या नगर पंचायत द्वारा लिया जाने वाला एक स्थानीय प्रॉपर्टी टैक्स है। यह टैक्स शहर या कस्बे की सीमा के भीतर आने वाली संपत्तियों — जैसे घर, दुकान, बिल्डिंग या किसी अन्य प्रकार की स्थायी निर्माण वाली संपत्ति — पर लगाया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो अगर आपके नाम पर कोई मकान, फ्लैट, प्लॉट पर बना घर या कमर्शियल बिल्डिंग है, तो उस पर होल्डिंग टैक्स लागू हो सकता है।

“होल्डिंग” शब्द का मतलब यहां उस संपत्ति से है जो नगर निकाय के रिकॉर्ड में आपके नाम से दर्ज होती है। हर ऐसी संपत्ति को एक अलग पहचान दी जाती है, जिसे आमतौर पर “होल्डिंग नंबर” कहा जाता है। इसी नंबर के आधार पर नगर निकाय आपके मकान या दुकान का रिकॉर्ड रखती है और उसी के अनुसार टैक्स निर्धारित किया जाता है।

यह समझना जरूरी है कि होल्डिंग टैक्स कोई एक बार देने वाला शुल्क नहीं है, बल्कि यह नियमित रूप से (आमतौर पर सालाना) जमा किया जाता है। यह सीधे केंद्र या राज्य सरकार को नहीं, बल्कि स्थानीय नगर निकाय को दिया जाता है। यानी यह टैक्स आपके अपने शहर या कस्बे के प्रशासन के पास जाता है, ताकि वे स्थानीय स्तर पर जरूरी काम कर सकें।

कई लोग इसे सिर्फ “हाउस टैक्स” समझते हैं, लेकिन यह केवल रिहायशी मकान तक सीमित नहीं है। दुकान, ऑफिस, गोदाम या किसी भी तरह की व्यावसायिक संपत्ति पर भी होल्डिंग टैक्स लगाया जाता है। इसलिए यह कहना सही होगा कि होल्डिंग टैक्स प्रॉपर्टी पर लगाया जाने वाला एक स्थानीय कर है, जो शहर की प्रशासनिक व्यवस्था और विकास से जुड़ा होता है।

होल्डिंग टैक्स क्यों लिया जाता है?

अक्सर लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर सरकार हमसे होल्डिंग टैक्स क्यों लेती है? क्या यह सिर्फ एक अतिरिक्त बोझ है, या इसके पीछे कोई ठोस कारण भी है?

दरअसल, होल्डिंग टैक्स का मुख्य उद्देश्य शहर या कस्बे के विकास और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना होता है। जब हम किसी शहर में रहते हैं, तो हमें कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं — जैसे पक्की सड़कें, नालियों की सफाई, कचरा उठाने की व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, पार्कों की देखभाल और कई जगहों पर पानी की आपूर्ति। इन सभी सेवाओं को चलाने और बनाए रखने के लिए नगर निगम या नगर परिषद को धन की जरूरत होती है।

यही धन मुख्य रूप से होल्डिंग टैक्स जैसे स्थानीय करों से आता है। यानी जो लोग शहर में संपत्ति के मालिक हैं, वे अपने हिस्से का योगदान देकर उस शहर की सुविधाओं को बेहतर बनाने में भागीदारी निभाते हैं।

अगर होल्डिंग टैक्स नहीं लिया जाए, तो नगर निकाय के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे। इससे सड़कें खराब रह सकती हैं, सफाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और जरूरी मरम्मत कार्य समय पर नहीं हो पाएंगे।

इस तरह देखा जाए तो होल्डिंग टैक्स सिर्फ एक सरकारी शुल्क नहीं, बल्कि शहर के सुचारू संचालन और विकास का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह नागरिक और प्रशासन के बीच जिम्मेदारी और सहभागिता का एक माध्यम भी है।

Citizen paying holding tax at municipal office in Bihar

होल्डिंग टैक्स के फायदे

कई लोग होल्डिंग टैक्स को सिर्फ एक खर्च या बोझ के रूप में देखते हैं, लेकिन अगर इसे सही नजरिए से समझा जाए तो इसके कई महत्वपूर्ण फायदे भी हैं। यह केवल पैसा देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इससे प्रॉपर्टी मालिक को कई तरह की सुविधा और सुरक्षा मिलती है।

सबसे पहला फायदा है स्थानीय विकास में सीधा योगदान। जब आप होल्डिंग टैक्स जमा करते हैं, तो वह पैसा आपके ही शहर की सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट और अन्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में लगाया जाता है। यानी आप अपने आसपास के माहौल को बेहतर बनाने में भागीदार बनते हैं।

दूसरा बड़ा फायदा है सरकारी रिकॉर्ड में आपकी प्रॉपर्टी का वैध प्रमाण। जब आपकी संपत्ति का होल्डिंग नंबर बना होता है और टैक्स नियमित रूप से जमा होता है, तो यह एक तरह से साबित करता है कि वह संपत्ति आपके नाम से दर्ज और मान्यता प्राप्त है। भविष्य में किसी भी विवाद की स्थिति में यह रिकॉर्ड आपके काम आ सकता है।

तीसरा फायदा है कानूनी सुरक्षा। अगर आप समय पर होल्डिंग टैक्स भरते हैं, तो आपकी संपत्ति को लेकर नगर निकाय की ओर से कोई कानूनी परेशानी नहीं होती।

इसके अलावा, बैंक लोन लेने, बिजली या पानी का कनेक्शन लेने, या किसी अन्य सरकारी प्रक्रिया में भी होल्डिंग टैक्स की रसीद और रिकॉर्ड काम आते हैं। इस तरह होल्डिंग टैक्स सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आपके अधिकार और सुविधा से भी जुड़ा हुआ है।

किन लोगों को होल्डिंग टैक्स देना होता है?

होल्डिंग टैक्स को लेकर एक आम गलतफहमी यह है कि शायद यह हर उस व्यक्ति को देना पड़ता है जो किसी घर या दुकान में रहता है। लेकिन असलियत थोड़ी अलग है। होल्डिंग टैक्स देने की जिम्मेदारी आमतौर पर उस व्यक्ति की होती है जिसके नाम पर संपत्ति दर्ज होती है, यानी प्रॉपर्टी के मालिक की।

सबसे पहले बात करें मकान मालिकों की। अगर आपके नाम पर शहर की सीमा के भीतर कोई रिहायशी मकान, फ्लैट या बिल्डिंग दर्ज है, तो उस पर होल्डिंग टैक्स लागू होगा। चाहे आप खुद उस घर में रहते हों या उसे खाली रखा हो, टैक्स देने की जिम्मेदारी आपकी ही रहेगी।

इसी तरह, जिन लोगों के पास दुकान, शोरूम, ऑफिस या कोई अन्य व्यावसायिक (कमर्शियल) संपत्ति है, उन्हें भी होल्डिंग टैक्स देना होता है। कई बार कमर्शियल प्रॉपर्टी पर रिहायशी मकान की तुलना में अलग दर से टैक्स लिया जाता है।

अगर आपने अपनी संपत्ति किराये पर दे रखी है, तब भी होल्डिंग टैक्स की जिम्मेदारी किरायेदार की नहीं, बल्कि मालिक की होती है। हालांकि कुछ मामलों में मालिक और किरायेदार आपसी समझौते से भुगतान की व्यवस्था तय कर सकते हैं, लेकिन नगर निकाय के रिकॉर्ड में जिम्मेदार व्यक्ति वही होगा जिसके नाम पर होल्डिंग दर्ज है।

इसलिए साफ शब्दों में कहें तो होल्डिंग टैक्स की जिम्मेदारी संपत्ति के वास्तविक और दर्ज मालिक की होती है, न कि उसमें रहने वाले व्यक्ति की।

होल्डिंग टैक्स कैसे तय होता है?

कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर होल्डिंग टैक्स की राशि तय कैसे की जाती है? क्या यह हर किसी के लिए समान होती है? इसका जवाब है — नहीं। होल्डिंग टैक्स कई अलग-अलग बातों को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।

नीचे दिए गए मुख्य आधारों पर टैक्स निर्धारित होता है:

✔ 1. प्रॉपर्टी का क्षेत्रफल (Area)

आपकी संपत्ति कितने वर्ग फीट या वर्ग मीटर में बनी है, यह सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। जितना बड़ा क्षेत्रफल होगा, टैक्स उतना अधिक हो सकता है।

✔ 2. उपयोग का प्रकार (Residential या Commercial)

रिहायशी मकान (घर, फ्लैट)

व्यावसायिक संपत्ति (दुकान, ऑफिस, गोदाम)

कमर्शियल प्रॉपर्टी पर आमतौर पर रिहायशी संपत्ति की तुलना में अधिक दर से टैक्स लगाया जाता है।

✔ 3. स्थान (Location)

शहर के मुख्य बाजार या पॉश इलाके में स्थित संपत्ति का टैक्स दर अलग हो सकता है, जबकि बाहरी या सामान्य क्षेत्र में स्थित संपत्ति पर दर कम हो सकती है।

✔ 4. निर्माण का प्रकार

पक्का मकान

अर्ध-पक्का

कच्चा निर्माण

निर्माण की गुणवत्ता और प्रकार भी टैक्स की गणना में भूमिका निभाते हैं।

✔ 5. नगर निकाय द्वारा निर्धारित दर

हर नगर निगम या नगर परिषद अपनी स्थानीय जरूरतों और नियमों के अनुसार दर तय करती है। इसलिए एक शहर का टैक्स दूसरे शहर से अलग हो सकता है।

इन सभी बातों को मिलाकर नगर निकाय आपकी संपत्ति का वार्षिक मूल्य निर्धारित करती है और उसी के आधार पर होल्डिंग टैक्स तय किया जाता है। इसलिए दो अलग-अलग लोगों का टैक्स समान होना जरूरी नहीं है।

बिहार में होल्डिंग टैक्स का सिस्टम

बिहार में होल्डिंग टैक्स की व्यवस्था नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत के माध्यम से संचालित की जाती है। राज्य के हर शहरी क्षेत्र में आने वाली संपत्तियों का रिकॉर्ड संबंधित नगर निकाय के पास दर्ज होता है।

सबसे पहले, हर मकान या व्यावसायिक संपत्ति को एक यूनिक होल्डिंग नंबर दिया जाता है। यही नंबर उस संपत्ति की आधिकारिक पहचान होता है। इसी के आधार पर टैक्स का निर्धारण और भुगतान का रिकॉर्ड रखा जाता है। अगर किसी संपत्ति का होल्डिंग नंबर नहीं बना है, तो उसे नगर निकाय में आवेदन देकर बनवाना पड़ता है।

बिहार में पिछले कुछ वर्षों में टैक्स प्रणाली को डिजिटल बनाने की दिशा में भी काम हुआ है। कई नगर निगमों में अब ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से होल्डिंग टैक्स की जानकारी देखना और भुगतान करना संभव हो गया है। इससे लोगों को बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत कम होती है।

साथ ही, नगर निकाय समय-समय पर टैक्स निर्धारण का पुनर्मूल्यांकन (Reassessment) भी कर सकती है, खासकर तब जब संपत्ति में नया निर्माण, विस्तार या उपयोग में बदलाव हुआ हो।

इस तरह बिहार में होल्डिंग टैक्स का सिस्टम स्थानीय प्रशासन के नियंत्रण में है, जहां रिकॉर्ड, निर्धारण और वसूली की पूरी प्रक्रिया नगर निकाय द्वारा संचालित की जाती है।

होल्डिंग टैक्स नहीं भरने पर क्या होगा?

कई लोग सोचते हैं कि अगर होल्डिंग टैक्स कुछ समय तक नहीं भरा जाए तो शायद कोई बड़ी समस्या नहीं होगी। लेकिन यह सोच आगे चलकर परेशानी का कारण बन सकती है। नगर निकाय के नियमों के अनुसार, समय पर टैक्स जमा करना जरूरी होता है।

अगर होल्डिंग टैक्स निर्धारित समय तक जमा नहीं किया जाता, तो सबसे पहले लेट फीस या ब्याज (Interest) लगाया जा सकता है। यानी जितनी देर आप भुगतान करेंगे, उतनी अतिरिक्त राशि भी जुड़ती जाएगी।

इसके बाद नगर निगम या नगर परिषद की ओर से नोटिस जारी किया जा सकता है। यह नोटिस आपको बकाया राशि जल्द जमा करने के लिए चेतावनी के रूप में भेजा जाता है।

अगर लंबे समय तक टैक्स नहीं भरा गया, तो मामला आगे बढ़ सकता है और कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। कुछ गंभीर मामलों में नगर निकाय संपत्ति को सील करने या अन्य प्रशासनिक कदम उठाने का अधिकार भी रखती है।

इसके अलावा, बकाया टैक्स होने की स्थिति में आपको बैंक लोन लेने, संपत्ति बेचने या ट्रांसफर करने में भी दिक्कत आ सकती है, क्योंकि साफ रिकॉर्ड दिखाना जरूरी होता है।

इसलिए समझदारी इसी में है कि होल्डिंग टैक्स को नजरअंदाज न किया जाए और समय पर भुगतान कर दिया जाए, ताकि भविष्य में किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी से बचा जा सके।

होल्डिंग टैक्स कैसे भरें?

होल्डिंग टैक्स भरना आज के समय में पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है। अब लोगों के पास ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों विकल्प मौजूद हैं, जिससे वे अपनी सुविधा के अनुसार भुगतान कर सकते हैं।

सबसे पारंपरिक तरीका है नगर निगम या नगर परिषद कार्यालय जाकर भुगतान करना। वहां संबंधित काउंटर पर अपना होल्डिंग नंबर बताकर बकाया राशि की जानकारी ली जा सकती है और नकद, चेक या अन्य स्वीकृत माध्यम से भुगतान किया जा सकता है। भुगतान के बाद रसीद लेना बेहद जरूरी है।

दूसरा तरीका है ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भुगतान। बिहार के कई नगर निकायों ने डिजिटल सुविधा शुरू की है, जहां आप अपना होल्डिंग नंबर डालकर बकाया टैक्स देख सकते हैं और डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग से सीधे भुगतान कर सकते हैं। इससे समय की बचत होती है और बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

इसके अलावा, जिन लोगों को ऑनलाइन प्रक्रिया समझने में कठिनाई होती है, वे कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) या जन सेवा केंद्र की मदद ले सकते हैं। वहां ऑपरेटर आपके दस्तावेज और होल्डिंग नंबर के आधार पर ऑनलाइन भुगतान करवा देते हैं।

भुगतान करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि रसीद सुरक्षित रखें और समय-समय पर बकाया की जांच करते रहें, ताकि भविष्य में कोई विवाद या परेशानी न हो।

Urban development in Bihar funded by holding tax

आम समस्याएं और लोगों की गलतफहमियां

होल्डिंग टैक्स को लेकर लोगों के बीच कई तरह की समस्याएं और गलतफहमियां देखने को मिलती हैं। अक्सर ये दिक्कतें जानकारी की कमी या पुराने रिकॉर्ड के कारण होती हैं।

सबसे बड़ी समस्या है जानकारी की कमी। कई लोगों को यह तक पता नहीं होता कि उनके मकान का होल्डिंग नंबर बना है या नहीं, या फिर कितनी राशि बकाया है। वे तब तक ध्यान नहीं देते जब तक कोई नोटिस नहीं आ जाता।

दूसरी आम गलतफहमी है कि होल्डिंग टैक्स बहुत ज्यादा होता है, जबकि वास्तविकता में यह संपत्ति के आकार और उपयोग के अनुसार तय होता है। कई बार लोग बिना सही जानकारी लिए ही यह मान लेते हैं कि उन पर गलत या ज्यादा टैक्स लगा दिया गया है।

तीसरी समस्या है रिकॉर्ड अपडेट न होना। अगर मकान में नया निर्माण हुआ है, मंजिल बढ़ाई गई है या मालिकाना हक बदला है, तो इसकी जानकारी नगर निकाय में अपडेट कराना जरूरी होता है। रिकॉर्ड अपडेट न होने पर भविष्य में विवाद या अतिरिक्त जुर्माना लग सकता है।

कुछ लोग यह भी समझते हैं कि अगर कई साल तक टैक्स नहीं भरा, तो मामला अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि बकाया राशि जुर्माने के साथ बढ़ती जाती है।

इन समस्याओं से बचने का सबसे अच्छा तरीका है समय-समय पर अपने होल्डिंग नंबर और बकाया की जांच करना, सही जानकारी रखना और जरूरत पड़ने पर नगर निकाय से संपर्क करना। जागरूकता ही सबसे बड़ी समाधान है।

बिहार के लोगों के लिए जरूरी सूचना

बिहार के कई शहरों और कस्बों में आज भी ऐसे मकान और दुकानें हैं, जिनका होल्डिंग नंबर बना तो है, लेकिन मालिक को इसकी पूरी जानकारी नहीं होती। कुछ जगहों पर तो अब तक होल्डिंग नंबर बनवाने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है। ऐसे में सबसे जरूरी बात यह है कि हर प्रॉपर्टी मालिक अपने रिकॉर्ड की स्थिति जरूर जांचे।

अगर आपके घर या दुकान का होल्डिंग नंबर नहीं बना है, तो संबंधित नगर निगम, नगर परिषद या नगर पंचायत में आवेदन देकर इसे बनवाना चाहिए। बिना होल्डिंग नंबर के भविष्य में टैक्स, बिजली कनेक्शन, पानी कनेक्शन या संपत्ति से जुड़े अन्य सरकारी कार्यों में दिक्कत आ सकती है।

इसके अलावा, समय-समय पर यह भी जांचते रहें कि कहीं आपके नाम पर कोई बकाया टैक्स तो दर्ज नहीं है। कई बार जानकारी के अभाव में राशि जमा नहीं हो पाती और बाद में जुर्माना जुड़ जाता है।

बिहार में अब कई नगर निकायों में ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध है, इसलिए जहां संभव हो, डिजिटल माध्यम का उपयोग करें। भुगतान की रसीद सुरक्षित रखें और अपने दस्तावेज व्यवस्थित रखें।

याद रखें, समय पर होल्डिंग टैक्स जमा करना सिर्फ एक कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह अपने शहर और राज्य के विकास में सीधी भागीदारी भी है। जागरूक रहें, नियमित रूप से अपने रिकॉर्ड की जांच करें और किसी भी भ्रम की स्थिति में सीधे नगर निकाय से जानकारी प्राप्त करें।

निष्कर्ष (Inside India News की ओर से)

होल्डिंग टैक्स को लेकर भले ही लोगों के मन में कई तरह के सवाल और भ्रम हों, लेकिन सच्चाई यह है कि यह किसी भी शहर की व्यवस्था और विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सिर्फ एक कर नहीं, बल्कि नागरिक और प्रशासन के बीच जिम्मेदारी का रिश्ता है। जब कोई प्रॉपर्टी मालिक समय पर होल्डिंग टैक्स जमा करता है, तो वह अपने शहर की सड़क, सफाई, रोशनी और अन्य बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने में योगदान देता है।

बिहार जैसे राज्य में, जहां तेजी से शहरीकरण हो रहा है, वहां स्थानीय निकायों की भूमिका और भी अहम हो जाती है। ऐसे में जरूरी है कि हर नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे। होल्डिंग नंबर की जांच, रिकॉर्ड को अपडेट रखना और समय पर टैक्स भुगतान करना भविष्य की कानूनी और प्रशासनिक परेशानियों से बचने का सबसे सरल तरीका है।

Inside India News की ओर से बिहार के सभी नागरिकों से अपील है कि होल्डिंग टैक्स को बोझ नहीं, बल्कि अपने शहर के विकास में सहभागिता के रूप में देखें। जागरूक बनें, सही जानकारी रखें और समय पर अपना दायित्व निभाएं — क्योंकि मजबूत और विकसित शहर की नींव जिम्मेदार नागरिकों से ही बनती है।

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