दौरे का परिचय (Introduction)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25–26 फरवरी 2026 को इज़रायल के दो दिवसीय राजकीय दौरे पर हैं, जो वर्तमान समय में भारत-इज़रायल संबंधों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। यह उनकी दूसरी यात्रा है — पहली बार उन्होंने जुलाई 2017 में इज़रायल का दौरा किया था, जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की उस देश की पहली यात्रा थी और तब से दोनों देशों के बीच रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने की दिशा में प्रयास जारी हैं
इस दौरे का मुख्य उद्देश्य है भारत-इज़रायल के रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और आर्थिक सहयोग को और अधिक गहरा करना। बातचीत में रक्षा तकनीक, सुरक्षा सहयोग, कृषि, ऊर्जा, व्यापार और नवाचार जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल होंगे, और कई क्षेत्रों में समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद जताई जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल की संसद नेसेट को भी संबोधित करेंगे — यह सम्मान केवल कुछ चुनिंदा वैश्विक नेताओं को ही मिलता है और दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक निकटता को दर्शाता है।
इज़रायल में इस दौरे को खास इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि वैश्विक भू-राजनीति, मध्य पूर्व के तनाव और सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत का सामरिक संतुलन मजबूत करना अहम है। यह यात्रा दोनों देशों के बीच मित्रता, साझा हितों और भविष्य के सहयोग को नई दिशा देने का संकेत है।
यात्रा की तिथि व कार्यक्रम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 और 26 फरवरी 2026 को दो दिवसीय राजकीय दौरे पर इज़रायल जा रहे हैं। यह उनकी दूसरी यात्रा है — इससे पहले वे 2017 में इतिहास रच चुके हैं।
यात्रा की शुरुआत:
25 फरवरी को पीएम मोदी सुबह भारत से रवाना होंगे और दोपहर 12:45 बजे इज़रायल के तेल अवीव में बेन गुरियन एयरपोर्ट पर उतरेंगे, जहाँ इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू उनका स्वागत करेंगे।
पहला दिन का कार्यक्रम:
एयरपोर्ट पर औपचारिक स्वागत के बाद पीएम मोदी यरुशलम के लिए रवाना होंगे।
शाम को 4:30 बजे इज़राइल की संसद नेसेट में भव्य स्वागत समारोह होगा और मोदी वहाँ संसद को संबोधित करेंगे — ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बनेंगे।
इसके बाद PM मोदी और नेतन्याहू के बीच द्विपक्षीय वार्ता होगी, जिसमें रक्षा, तकनीक और सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत करने की संभावना है।
शाम को प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में राजकीय भोज भी आयोजित होगा।
दूसरा दिन (26 फरवरी):
सुबह मोदी याद वाशेम होलोकॉस्ट स्मारक का दौरा कर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।
उसके बाद इज़राइल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से मुलाकात और विस्तृत वार्ता आयोजित होगी, जिसमें कई समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है।
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू बैठक के बाद संयुक्त बयान जारी करेंगे, और दोपहर के बाद भारत के लौटने की तैयारियाँ शुरू होंगी।
इस दौरे के दौरान रणनीतिक, रक्षा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, एआई और सुरक्षा साझेदारी जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है, जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग और मजबूत होगा।
मुख्य उद्देश्य और एजेंडा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 25-26 फरवरी 2026 का इज़रायल दौरा सिर्फ औपचारिक मुलाक़ात नहीं है बल्कि इसमें दोनों देशों के रणनीतिक साझेदारी के गहरे आयामों को परखने और उसे आगे बढ़ाने का स्पष्ट एजेंडा शामिल है। यह दौरा उन महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित है जिनका प्रभाव न सिर्फ भारत-इज़रायल रिश्तों पर पड़ेगा, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और आर्थिक साझेदारी पर भी होगा।
सबसे पहले, रणनीतिक और रक्षा सहयोग इस दौरे का एक प्रमुख लक्ष्य है। भारत और इज़रायल के बीच रक्षा तकनीक जैसे आयरन डोम, उन्नत मिसाइलें, ड्रोन्स और सुरक्षा प्रणालियों का साझा विकास और आपूर्ति-खरीद इस बातचीत का मुख्य हिस्सा है। इन तकनीकों से भारत की रक्षा क्षमताओं को और मजबूत किया जा सकता है।
दूसरा, तकनीकी, साइबर, एआई और नवाचार (Innovation) सहयोग पर ध्यान दिया जाएगा। दोनों देशों के विचार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और नवीन तकनीकी क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं पर हैं, जिससे भविष्य की टेक्नोलॉजी साझेदारी को बढ़ावा मिलेगा।
तीसरा, व्यापार, ऊर्जा और कृषि जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाना भी एजेंडा का हिस्सा है। व्यापार, जल प्रबंधन, कृषि तकनीक और आर्थिक साझेदारी पर गहन चर्चा की संभावना है, ताकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती मिले।
चौथा, इस दौरे के दौरान क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सामूहिक दृष्टिकोण साझा करना भी शामिल है — जैसे मध्य-पूर्व सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और संयुक्त उभरते संकटों के समाधान पर परामर्श।
कुल मिलाकर, इस यात्रा का एजेंडा रणनीति से लेकर आर्थिक और तकनीकी सहयोग तक अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों को समाहित करता है, जो भविष्य में भारत-इज़रायल रिश्तों को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकता है।
रणनीतिक और रक्षा सहयोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे का एक सबसे अहम हिस्सा रक्षा और रणनीतिक सहयोग है, जो दोनों देशों के बीच गहरे सैन्य और सुरक्षा रिश्तों को और मजबूत करेगा। इस बातचीत का केंद्रबिंदु आधुनिक रक्षा तकनीक, मिसाइल और एयर सुरक्षा प्रणालियों से संबंधित मुद्दे हैं, जिन पर दोनों देशों ने पिछले कई सालों से सहयोग किया है और अब उसे नई ऊँचाइयों तक ले जाने की योजना है।
सबसे बड़ी चर्चा इज़रायल के आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर है। इज़रायल दुनिया की सबसे उन्नत शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस प्रणालियों में से एक आयरन डोम की तकनीक भारत को ‘मेक इन इंडिया’ के तहत साझा करने का ऑफर दे रहा है। अगर यह समझौता होता है, तो भारत में भी इसी तकनीक का उत्पादन संभव हो जाएगा, जिससे देश की हवाई सुरक्षा काफी मजबूत हो सकती है। यह प्रणाली रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन हमलों को हवा में ही नष्ट करने में सक्षम है, और इसकी सफलता दर को 90% से ज़्यादा बताया जाता है।
भारत पहले से ही इज़रायल के साथ मेड इन इंडिया मॉडल में रक्षा उपकरणों और हथियारों का साझेदारी कर रहा है, जैसे ड्रोन, मिसाइल और एवियोनिक्स संबंधित सिस्टम। इस दौरे के दौरान उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच रक्षा समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होंगे और तकनीक साझा करने के नए प्रस्तावों को अंतिम रूप दिया जाएगा, जिससे भारत की रणनीतिक क्षमताओं को नई ताक़त मिलेगी।
सुरक्षा सहयोग केवल उपकरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामरिक साझेदारी, खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान और संयुक्त प्रशिक्षण भी शामिल होंगे, जिससे भारत और इज़रायल दोनों ही राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकेंगे।
व्यापार, ऊर्जा और तकनीकी साझेदारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे में केवल रक्षा ही नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, तकनीकी और आर्थिक सहयोग को भी नई ऊँचाइयों पर ले जाने का प्रयास शामिल है। इस दौरे से पहले ही भारत और इज़रायल के बीच मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement- FTA) की बातचीत शुरू हो चुकी है, जिसका पहला दौर 23 फरवरी 2026 में नई दिल्ली में जारी है और यह 26 फरवरी 2026 तक चल रहा है। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार बाधाओं को कम करना और व्यापार व निवेश के अवसर बढ़ाना है।
FTA वार्ता से पहले ही 2025 में भारत-इज़रायल के बीच टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) पर सहमति बन चुकी है, जिससे व्यापक व्यापार और आर्थिक संबंधों को भविष्य में एक औपचारिक रूप मिलने की संभावना बढ़ी है। यह समझौता दोनों देशों के एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग), कृषि प्रौद्योगिकी, सेवाओं और उभरती तकनीकों जैसे क्षेत्रों के सहयोग को सरल और प्रभावी बनाने में मदद करेगा।
इसके अलावा, बातचीत में साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम तकनीक और अंतरिक्ष जैसी उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में साझेदारी के बारे में भी चर्चा की जाएगी। इन तकनीकी सहयोगों से नए शोध-विकास (R&D), डेटा साझा करना, और साझा नवाचार परियोजनाएँ मजबूत हो सकती हैं, जिससे दोनों देशों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा में मदद मिल सकती है।
ऊर्जा क्षेत्र में भी सहयोग के अवसर तलाशे जाएंगे, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा, जल प्रबंधन और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्रों में। हाल के वर्षों में भारत और इज़राइल विभिन्न व्यापारिक और तकनीकी बहुपक्षीय मंचों जैसे I2U2 ग्रुप के ज़रिए भी निवेश व साझा परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं — यह मंच भारत, इज़राइल, यूएई और अमेरिका को जोड़ता है और औद्योगिक, ऊर्जा तथा कृषि सहयोग को आगे बढ़ाता है।
इस दौरे से दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में स्पष्ट रूप से मजबूती आएगी, जिससे भारत के निर्यात-आयात, निवेश एवं तकनीकी साझेदारी को विस्तार मिलेगा और दक्षिण पश्चिम एशिया तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोनों देशों की भागीदारी अधिक प्रभावशाली बनेगी।
राजनयिक कार्यक्रम – संसद संबोधन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे का एक सबसे ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक हिस्सा है इज़रायल की संसद “नेसेट” (Knesset) को संबोधित करना। नेसेट इज़रायल का एक सदनीय उच्च विधायी निकाय है जो देश के लोकतांत्रिक ढांचे का प्रमुख अंग है और कानून बनाने, सरकार की समीक्षा और राष्ट्रीय नीतियों पर निर्णय लेने जैसी शक्तियाँ रखता है।
यात्रा के पहले दिन, यरुशलम में शाम के समय नेसेट के प्लेनम सत्र में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया जाएगा और वे संसद में भाषण देंगे, जिससे वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बनेंगे जो इज़रायली संसद को सीधे संबोधित करेंगे। इस अवसर को दोनों देशों के बीच कूटनीतिक सम्मान और गहरे संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है। ऐसे संबोधन सामान्यतः केवल कुछ चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय नेताओं को ही अवसर मिलता है, और यह दर्शाता है कि भारत-इज़रायल साझेदारी को उच्च स्तर पर तवज्जो दी जा रही है।
मोदी के संसद संबोधन में रणनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा की उम्मीद है। यह मंच भारत-इज़रायल के बढ़ते रिश्तों को अंतरराष्ट्रीय और लोकतांत्रिक मंच पर प्रदर्शित करने का अवसर है, जहाँ दोनों देशों के हितों और साझेदारी की दिशा को वैश्विक ध्यान भी मिलेगा।
हालाँकि इज़रायली घरेलू राजनीति में कुछ हलचल भी रही है — विपक्षी पार्टियों ने विरोध जताते हुए संबोधन का बहिष्कार करने की चेतावनी दी — पर संसद के स्पीकर और सरकार ने इसे सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं कि प्रधानमंत्री का भाषण भरपूर सम्मान के साथ हो और सदन खाली न दिखे।
यह राजनयिक कार्यक्रम न सिर्फ दोनों देशों के बीच मैत्री को दिखाता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक और सामरिक साझेदारी को भी मजबूती देने का संकेत है।
क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 25-26 फरवरी 2026 का इज़रायल दौरा सिर्फ भारत-इज़रायल के द्विपक्षीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्व राजनीति और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन में भी अहम भूमिका निभाता है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव, सुरक्षा चुनौतियाँ और वैश्विक शक्ति समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, और भारत अपनी कूटनीति को बहुआयामी और संतुलित रूप से आगे बढ़ा रहा है।
सबसे पहले, पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता प्रमुख चुनौतियाँ हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बेहद बढ़ा हुआ है, और इसी पृष्ठभूमि में भारत का इज़रायल जैसे सहयोगी देश के साथ मजबूत रक्षा और सुरक्षा साझेदारी दिखाना एक रणनीतिक संकेत है कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
दूसरा, इस दौरे के माध्यम से भारत रणनीतिक गठबंधनों में अपनी भागीदारी को भी मजबूती दे रहा है। इज़राइल ने ‘हेक्सागन एलायंस’ नामक एक नया सुरक्षित रणनीतिक फ्रेमवर्क प्रस्ताव किया है, जिसमें भारत को केंद्रीय भूमिका दी जा रही है। यह एलायंस मुख्यतः सुरक्षा, खुफिया और सामरिक सहयोग के लिए बनाया जा रहा है और यह पूरे पश्चिम एशिया-मध्य पूर्व के सुरक्षा परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है।
तीसरा, यह दौरा भारत की बहुपक्षीय कूटनीति और वैश्विक मान्यता को भी दर्शाता है। भारत ने न केवल इज़रायल के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है, बल्कि अन्य वैश्विक साझेदारों के साथ भी मिलकर टेक्नोलॉजी, सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहकार्य बढ़ाया है। उदाहरण के तौर पर भारत मुख्य वैश्विक तकनीकी गठबंधनों और आर्थिक गलियारों में भाग ले रहा है, जो दक्षिण-पश्चिम एशियाई-यूरोपीय कनेक्टिविटी को मजबूती देते हैं और चीन-केन्द्रित परियोजनाओं का विकल्प प्रस्तुत करते हैं।
चौथा, ऐसे दौरे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर डालते हैं, क्योंकि भारत अपने प्रभाव को मध्य पूर्व, यूरोप और एशिया के बीच एक टेक्नोलॉजी और सुरक्षा कड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है। यह न केवल भारत-पाकिस्तान या भारत-चीन के संबंधों को प्रभावित करता है, बल्कि पूरे क्षेत्र में साझा सुरक्षा और आर्थिक हितों को एक नई दिशा देता है।
कुल मिलाकर यह दौरा एक वैश्विक राजनीति-सहयोग प्रयास है, जिसमें भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित कर रहा है, बल्कि शांति, सहयोग और सामरिक संतुलन के लिए भी एक अंतरराष्ट्रीय साझेदार के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत कर रहा है।
समालोचना तथा प्रतिक्रियाएँ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे को लेकर भारत और विदेश दोनों तरफ प्रतिक्रियाएँ और आलोचनाएँ भी सामने आई हैं, जिनमें कुछ नैतिक, राजनैतिक और कूटनीतिक मुद्दों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सबसे प्रमुख आलोचना भारत के पुराने विदेश नीति रुख से जुड़ी है, जिसमें कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने फलस्तीनियों के हितों को त्याग दिया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और अन्य नेताओं ने कहा कि जब इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष में गाजा समेत अन्य क्षेत्रों में नागरिकों पर हमले और नरसंहार जैसे आरोपों की चर्चा हो रही है, तब प्रधानमंत्री का इज़रायल जाना और उन्हें समर्थन देना भारत की संतुलित नीति की परंपरा के विपरीत है।
कुछ विश्लेषकों ने भी लिखा है कि यह दौरा अब 2017 जैसी सामान्य कूटनीतिक यात्रा नहीं रहा, बल्कि इसके वैश्विक प्रभाव और नैतिक संकेत पर पुनर्विचार की जरुरत है। उनके अनुसार, इज़रायल के नेतृत्व के खिलाफ बहुप्राप्त वार अपराध आरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दे की पृष्ठभूमि में यह दौरा भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और नैतिक स्थिति को जोखिम में डाल सकता है।
इज़रायल के अपने भीतर भी प्रतिक्रिया मिली है। वहाँ के मुख्य विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के नेसेट (संसद) संबोधन से पहले कुछ न्यायिक प्रोटोकॉल उल्लंघन पर सवाल उठाए हैं — जैसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को आमंत्रण न दिया जाना। विपक्ष ने चेतावनी दी है कि अगर प्रोटोकॉल का सम्मान नहीं हुआ, तो वे भाषण का बायकॉट कर सकते हैं, जिससे यह द्विपक्षीय दौऱा राजनीतिक विवाद का केंद्र बन सकता है।
इसके अलावा सोशल मीडिया और कुछ कार्यकर्ताओं ने भारत में भी इस यात्रा का समर्थन नहीं किया, यह कहते हुए कि यह दौरा भारत की वैश्विक भूमिकाओं, मुक्त और संतुलित कूटनीति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में आलोचना इस बात पर भी केंद्रित है कि भारत अपनी परंपरागत मध्य-पूर्व नीति से भटकर केवल एक पक्ष का समर्थन कर रहा है।
इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि दौरा सिर्फ दोस्ती और सहयोग का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह कई दृष्टिकोणों से राजनीतिक और नैतिक बहस का विषय भी बन गया है।
भारत-इज़राइल रिश्तों का ऐतिहासिक महत्व
भारत और इज़राइल के बीच संबंधों का इतिहास लंबा, बदलता रहा है और यह ओन-गोइंग राजनीति और रणनीति की मिसाल है। सबसे पहले भारत ने इज़राइल को 17 सितंबर 1950 में आधिकारिक रूप से मान्यता दी, लेकिन उस समय पूर्ण राजनयिक सम्बन्ध नहीं बनाए गए थे। असल में दोनों देशों के बीच राजनयिक जुड़ाव 29 जनवरी 1992 को स्थापित हुआ, जब भारत ने तेल अवीव में इज़राइली दूतावास खोला और पूर्ण रूप से रिश्ता शुरू किया। उस वक्त शीत-युद्ध के बाद परिस्थितियाँ बदल रही थीं और भारत ने अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने का निर्णय लिया।
1992 के बाद से दोनों देशों के द्विपक्षीय सम्बन्ध धीरे-धीरे मजबूत होने लगे। शुरुआत में यह रिश्ते रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर ज्यादा केंद्रित थे — इज़राइल उन्नत सैन्य तकनीक, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और रक्षा उपकरण भारत को सप्लाय करता रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच सामरिक साझेदारी गहरी हुई है।
समय के साथ व्यापार, तकनीकी, कृषि और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग भी मजबूत हुआ है। उदाहरण के लिए, दोनों देशों का व्यापार आयात-निर्यात और तकनीकी साझेदारी लगातार बढ़ी है, जिससे अर्थव्यवस्थाओं और नवाचार क्षेत्रों को लाभ मिला है।
रणनीतिक और रक्षा सहयोग भारत-इज़राइल रिश्तों का बुनियाद रहा है, लेकिन अब यह साझेदारी बहुआयामी हो गई है — जिसमें सुरक्षा, तकनीकी नवाचार, व्यापार और ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। यह साझेदारी भारत के लिए वैश्विक कूटनीति में बल प्रदान करती है और क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों को आगे बढ़ाती है।
आज भारत और इज़राइल रणनीतिक साझेदार हैं और उनके रिश्ते दोनों देशों के लिए रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण बन चुके हैं, जो भविष्य में सुरक्षा, विकास और वैश्विक भागीदारी के नए अवसर खोलते हैं।
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